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रात 12 बजे के बाद खिड़की मत खोलना – एक डरावनी सच्ची-सी कहानी

बारिश की वह रात कुछ ज़्यादा ही खामोश थी।
हवा में अजीब-सी ठंडक थी, और सड़क पर लगी स्ट्रीट लाइटें ऐसे झपक रही थीं जैसे किसी राज़ की गवाह हों।

अनुज अपने नए किराए के घर की खिड़की से बाहर देख रहा था।
दिल में अजीब-सी घबराहट थी, जिसका कोई ठोस कारण नहीं था।

यह घर शहर के पुराने हिस्से में था।
मकान मालिक ने बहुत सस्ते में दे दिया था, बस एक ही शर्त पर—
रात 12 बजे के बाद सामने वाले कमरे की खिड़की मत खोलना।”

अनुज ने उस बात को मज़ाक समझा था।

लेकिन आज…
रात के ठीक 12:07 पर
उसे खिड़की के शीशे में
किसी परछाई की झलक दिखी।

वह पलटा।
कमरा खाली था।

उसने खुद को समझाया—
“थकान है… बस थकान।”

लेकिन तभी…
टक… टक… टक…

कांच पर नाखूनों के खुरचने जैसी आवाज़।

अनुज का दिल तेज़ी से धड़कने लगा।
वह धीरे-धीरे खिड़की की ओर बढ़ा।

बाहर कोई नहीं था।
लेकिन शीशे पर
एक हथेली का निशान था
—अंदर की तरफ।

उसका खून जम गया।


🕯️ पुरानी डायरी

अगले दिन अनुज ने घर की अलमारी साफ़ करते हुए
एक पुरानी, धूल भरी डायरी पाई।

पहले ही पन्ने पर लिखा था—

अगर तुम यह पढ़ रहे हो,
तो इसका मतलब है कि
वह तुम्हें देख चुका है।”

डायरी में लिखा था कि इस घर में
पहले भी कई लोग रहे…
लेकिन कोई ज़्यादा दिन नहीं टिका।

हर किसी ने
एक ही बात कही थी

“रात को खिड़की में
अपनी ही परछाई
कुछ सेकंड देर से हिलती है…”


⏳ सच्चाई का डर

उस रात अनुज ने हिम्मत करके
12 बजे ठीक
खिड़की के सामने खड़ा होने का फैसला किया।

घड़ी ने 12:00 बजाए।

शीशे में
उसका अक्स था।

सब सामान्य।

फिर…
अनुज ने हाथ उठाया।

असल हाथ ऊपर था।
लेकिन शीशे में
हाथ धीरे-धीरे उठा।

देरी।

और फिर—
शीशे वाला अनुज
मुस्कुरा दिया।

जबकि असली अनुज नहीं मुस्कुरा रहा था।


😨 आख़िरी पल

शीशे से एक आवाज़ आई—

“अब मेरी बारी है…”

कांच में दरारें पड़ीं।
परछाई बाहर आने लगी।

अनुज चीख भी नहीं पाया।

अगली सुबह
मकान मालिक आया।

घर बिल्कुल खाली था।

बस
शीशे में
एक नया अक्स था—

अनुज
जो अब
कभी पलक नहीं झपकाता।

और मकान मालिक ने
“किराए पर उपलब्ध”
का बोर्ड फिर से टांग दिया।

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